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रूबल हुसैन का छलका दर्द: करियर का सबसे बड़ा पछतावा और निदाहास ट्रॉफी का वो काला साया
बांग्लादेश क्रिकेट के इतिहास में रूबल हुसैन का नाम एक ऐसे गेंदबाज के रूप में दर्ज है, जिसने कई मौकों पर अपनी टीम को गौरवान्वित किया है। 2015 के विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ उनकी जादुई गेंदबाजी आज भी हर क्रिकेट प्रेमी के जेहन में ताजा है। वह पल उनके जीवन के सबसे सुखद क्षणों में से एक था। लेकिन, हर खिलाड़ी के करियर में कुछ ऐसे पल भी आते हैं जिन्हें वह भूलना चाहता है, पर चाहकर भी भूल नहीं पाता।
मीरपुर में अपने विदाई समारोह के दौरान रूबल हुसैन भावुक नजर आए। हालांकि वह अपने करियर के पछतावों के बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहते थे, लेकिन एक हालिया साक्षात्कार में उन्होंने उस एक घटना का जिक्र किया जो उन्हें आज भी कचोटती है – 2018 निदाहास ट्रॉफी का फाइनल।
निदाहास ट्रॉफी 2018: जब जीत मुट्ठी से फिसल गई
श्रीलंका की धरती पर खेली गई वह त्रिकोणीय श्रृंखला, जिसमें भारत, बांग्लादेश और श्रीलंका शामिल थे, पूरे क्रिकेट जगत में रोमांच का केंद्र बनी हुई थी। फाइनल मुकाबला भारत और बांग्लादेश के बीच था। कोलंबो के प्रेमदासा स्टेडियम में खेले गए इस मैच में बांग्लादेश जीत के बेहद करीब था। मैच के अंतिम दो ओवरों का रोमांच चरम पर था।
भारत को जीत के लिए आखिरी 12 गेंदों पर 34 रनों की दरकार थी। कप्तान ने गेंद अनुभवी रूबल हुसैन के हाथों में थमाई। 19वां ओवर किसी भी टी20 मैच का रुख तय करने वाला होता है। बांग्लादेशी फैंस को उम्मीद थी कि रूबल अपनी सटीक यॉर्कर और गति से भारत को रोक लेंगे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
दिनेश कार्तिक का वो तूफान और रूबल की बेबसी
स्ट्राइक पर थे दिनेश कार्तिक। रूबल जैसे ही गेंदबाजी के लिए आए, कार्तिक ने उन पर धावा बोल दिया। उस ओवर में कार्तिक ने रूबल की गेंदों पर दो छक्के और दो चौके जड़ दिए। देखते ही देखते उस ओवर में 22 रन बन गए। जो मैच पूरी तरह बांग्लादेश के नियंत्रण में लग रहा था, वह अचानक हाथ से फिसल गया। रूबल ने स्वीकार किया कि उस ओवर के बाद मैच का पासा पूरी तरह पलट गया था।
रूबल ने उस रात को याद करते हुए कहा, “निदाहास ट्रॉफी के उस फाइनल ने मुझे बहुत रुलाया। जिस तरह से दिनेश कार्तिक ने वे शॉट खेले… हम श्रीलंका में वह मैच लगभग जीत चुके थे, लेकिन अंत में हार गए। यही मेरा सबसे बड़ा पछतावा है।”
घबराहट और कप्तान शाकिब से बातचीत की कमी
एक पेशेवर खिलाड़ी के तौर पर अपनी गलतियों का विश्लेषण करते हुए रूबल ने बताया कि आखिर उस ओवर में उनसे चूक कहां हुई। उन्होंने कहा, “मैंने चीजें बहुत जल्दबाजी में कीं। मुझे कप्तान शाकिब अल हसन भाई से थोड़ी और बात करनी चाहिए थी। पहली बाउंड्री लगने के बाद, मैं थोड़ा घबरा गया था और अपना धैर्य खो बैठा था।”
रूबल का मानना है कि अगर वह एक पल रुककर शाकिब के साथ फील्ड सेटिंग या गेंदबाजी की रणनीति पर चर्चा करते, तो शायद परिणाम कुछ और हो सकता था। लेकिन दबाव के उस क्षण में, अनुभव के बावजूद वह पैनिक कर गए।
2009 की वो हार और परिपक्वता का अंतर
इंटरव्यू के दौरान रूबल से 2009 में श्रीलंका के खिलाफ मिली एक और करीबी हार के बारे में भी पूछा गया। उस मैच में बांग्लादेश ने केवल 6 रन पर श्रीलंका के 5 विकेट झटक लिए थे, लेकिन फिर मुथैया मुरलीधरन ने मैच का रुख बदल दिया था। रूबल ने कहा कि वह हार उन्हें उतनी नहीं चुभती।
इसके पीछे का कारण बताते हुए उन्होंने कहा, “वह मेरा केवल दूसरा अंतरराष्ट्रीय मैच था। मैदान पर करीब 25-26 हजार दर्शक मौजूद थे। मैं बहुत नर्वस था और उस समय मेरे लिए फील्ड सेट करना भी मुश्किल काम था।” एक युवा खिलाड़ी की गलती को समझा जा सकता है, लेकिन 2018 में रूबल एक स्थापित गेंदबाज थे, इसीलिए निदाहास ट्रॉफी की हार का घाव ज्यादा गहरा है।
निष्कर्ष: एक खिलाड़ी का संघर्ष
रूबल हुसैन की यह कहानी हमें याद दिलाती है कि खेल के मैदान पर एक ओवर या एक गेंद किसी का भी करियर बदल सकती है। रूबल ने अपने करियर में कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन उनकी ईमानदारी कि उन्होंने अपनी गलती स्वीकार की, उन्हें प्रशंसकों की नजरों में और भी बड़ा बनाती है। निदाहास ट्रॉफी की वो हार भले ही एक टीस बनकर उनके दिल में रहे, लेकिन बांग्लादेशी क्रिकेट में उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।
- मुख्य उपलब्धि: 2015 विश्व कप में इंग्लैंड के खिलाफ जीत के नायक।
- सबसे बड़ा दुख: निदाहास ट्रॉफी 2018 फाइनल का 19वां ओवर।
- सीख: दबाव की स्थिति में संयम और टीम के साथियों के साथ संवाद का महत्व।
