राजस्थान रॉयल्स की बिक्री और गहराता विवाद: क्या प्रक्रिया निष्पक्ष थी?
इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) की सबसे चर्चित फ्रेंचाइजी में से एक, राजस्थान रॉयल्स (RR) की हालिया बिक्री ने क्रिकेट और बिजनेस जगत में हलचल मचा दी है। रविवार को यह घोषणा की गई कि भारतीय मूल के दिग्गज व्यवसायी लक्ष्मी मित्तल और अदार पूनावाला ने इस फ्रेंचाइजी को लगभग 1.65 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 15,660 करोड़ रुपये) में खरीद लिया है। हालांकि, इस बड़ी डील के तुरंत बाद विवाद की स्थिति पैदा हो गई है।
सोमानी ग्रुप के गंभीर आरोप
अमेरिका स्थित निवेशकों के एक कंसोर्टियम, जिसका नेतृत्व एरिज़ोना के टेक उद्यमी कल सोमानी कर रहे हैं, ने इस सौदे पर अपनी गहरी निराशा और आश्चर्य व्यक्त किया है। इस समूह में एनएफएल (NFL) की डेनवर ब्रोंकोस के मालिक रॉब वाल्टन और डेट्रायट लायंस की शीला फोर्ड हैम्प के बेटे माइकल हैम्प जैसे हाई-प्रोफाइल निवेशक शामिल थे। सोमानी ग्रुप का दावा है कि उन्होंने राजस्थान रॉयल्स के साथ-साथ दक्षिण अफ्रीका की पार्ल रॉयल्स और कैरेबियन प्रीमियर लीग की बारबाडोस रॉयल्स के लिए सबसे ऊंची बोली लगाई थी।
मंगलवार को जारी एक बयान में, कंसोर्टियम ने कहा कि रॉयल्स बोर्ड का मालिकाना हक किसी अन्य समूह को सौंपने का निर्णय ‘समान अवसर’ को प्रतिबिंबित नहीं करता है। उनका आरोप है कि बोली के चार चरणों के दौरान वे लगातार शीर्ष पर रहे थे, लेकिन अंत में परिणाम उनके पक्ष में नहीं रहा।
बोली की प्रक्रिया और आंकड़ों का गणित
रिपोर्टों के अनुसार, सोमानी के नेतृत्व वाले समूह ने 1.635 बिलियन अमेरिकी डॉलर की बोली लगाई थी। वहीं, लक्ष्मी मित्तल और अदार पूनावाला के कंसोर्टियम ने 1.65 बिलियन डॉलर की बोली के साथ बाजी मार ली। हालांकि, सोमानी ग्रुप का कहना है कि वे शुरू से अंत तक अग्रणी थे और मित्तल, जिन्होंने पहले स्वतंत्र रूप से बोली लगाई थी, उनकी अधिकतम बोली 1.1 बिलियन डॉलर के आसपास मानी जा रही थी।
कंसोर्टियम ने अपने बयान में कहा, “हम राजस्थान रॉयल्स के स्वामित्व समूह का हिस्सा न बन पाने से बेहद निराश हैं। यह छह महीने की लंबी प्रक्रिया थी जिसमें हम शुरू से अंत तक अग्रणी बोलीदाता थे।” समूह ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य आईपीएल को अंतरराष्ट्रीय ऊंचाइयों पर ले जाना था और उनके पास खेल जगत के वैश्विक दिग्गजों का समर्थन प्राप्त था।
पारदर्शिता पर सवाल और अफवाहों का खंडन
पिछले कुछ दिनों से मीडिया में ऐसी खबरें चल रही थीं कि सोमानी ग्रुप ने अपनी बोली वापस ले ली है या उनके पास पर्याप्त धन की कमी है। कंसोर्टियम ने इन खबरों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका समूह पूरी तरह से वित्तपोषित था और वे सौदे को बंद करने के लिए पूरी तरह तैयार थे।
बयान में आगे कहा गया, “प्रेस में प्लांट की गई खबरों के विपरीत, हमारा समूह हमेशा पूरी तरह से फंडेड रहा और हमने कभी अपनी बोली वापस नहीं ली। हमारे पास सभी आवश्यक दस्तावेज तैयार थे और हमें बताया गया था कि शनिवार को बोर्ड की बैठक हमारे कंसोर्टियम को मंजूरी देने के लिए बुलाई गई थी। लेकिन अंत में ऐसा नहीं हुआ।”
बोर्ड की चुप्पी और भविष्य की राह
यह निर्णय रॉयल्स बोर्ड द्वारा मई के पहले सप्ताहांत में लिया गया था। कल सोमानी, जो 2021 से बोर्ड के सदस्य थे, ने इस बैठक से खुद को अलग कर लिया था क्योंकि वे स्वयं एक खरीदार के रूप में प्रक्रिया में शामिल थे। उन्होंने लंदन में मौजूदा मुख्य मालिक मनोज बडाले के साथ विवरणों को अंतिम रूप देने के लिए मुलाकात भी की थी। हालांकि, बोर्ड ने एक कंसोर्टियम के ऊपर दूसरे को क्यों चुना, इस पर अभी तक कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है। मनोज बडाले ने भी इस संबंध में पूछे गए सवालों का फिलहाल कोई जवाब नहीं दिया है।
नए बोर्ड का गठन और बीसीसीआई की मंजूरी
भविष्य की बात करें तो, बीसीसीआई और अन्य आवश्यक अनुमतियां मिलने के बाद, 2026 की तीसरी तिमाही में नया रॉयल्स बोर्ड अस्तित्व में आने की उम्मीद है। इस नए बोर्ड का नेतृत्व लक्ष्मी मित्तल, उनके बेटे आदित्य मित्तल, बेटी वनीषा मित्तल-भाटिया और अदार पूनावाला करेंगे। मनोज बडाले की फ्रेंचाइजी में अल्पांश हिस्सेदारी (minority stake) बनी रहेगी।
सोमानी ग्रुप ने भले ही इस परिणाम को निराशाजनक बताया है, लेकिन उन्होंने इसे अपनी ‘व्यापक यात्रा’ का एक हिस्सा माना है। हालांकि, आईपीएल जैसी बड़ी लीग में इस तरह के पारदर्शिता के सवाल उठना निश्चित रूप से खेल के व्यापारिक ढांचे के लिए एक गंभीर विषय है।
- सोमानी ग्रुप की बोली: $1.635 बिलियन
- मित्तल-पूनावाला की बोली: $1.65 बिलियन
- विवाद का मुख्य कारण: प्रक्रिया में पारदर्शिता की कथित कमी
- नया बोर्ड कब आएगा: 2026 की तीसरी तिमाही
